गंगा
किन धाराओं को संवारती
किन वनो में मधु स्वर भरती
किन जीवो संग करे इष्ठता
किन औषध को स्पर्श करके
किन द्रव्यों को धारण करके
किन वृक्षों का कर अभिवादन
किन पत्थरो का कर मर्दन
किन तालो का निर्माण कर
किन जीवो को तू धारण कर
किन लघु कणो को बहाकर
किन हिम खंडो से नहाकर
किन पथिकों से विचार करके
किस मधुरता को तू धरके
किस सरलता को तू लेकर
किस शीतलता को प्रखर कर
कर उच्चताओं का परित्याग
किस समानता से ले ताप
किस ऊष्मा या प्रचंडता
किन मेघों जल संग मित्रता
किन मानवो के संग निर्मला
किन जलधारों से निर्धारित
किन उपधारों में विभाजित
किसे पोषण प्रदान करती
किस समाज की प्यास हरती
की तुम मेरे संग भी आना
नाद अपना अवश्य सुनाना
- (विक्रमादित्य)

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